Sunday, 12 August 2018

मगर तुम्हारे दिल मे क्या हैं मुझको बता दो



अब चाहे जहर दो या दवा दो,
मगर तुम्हारे दिल मे क्या हैं मुझको बता दो


ख़ाक हो जाए परवाने उनकी किस्मत हैं
आज नकाब अपने चेहरे से हटा दो

खामोशियो और चुप्पियों को तालों में बंद करो
हर सितम के ख़िलाफ़ आवाज उठा दो

आज की रात आगोश में हम तुम पिघल  जाए
सारी शर्म और बहानो को आग लगा दो

खुद ही आ जाओ मेरी बाहो में
और फिर शर्मा के ऑंख झुका दो

चिंगारिया कभी सैलाब  भी उगल सकती हैं
बेखौफ हवाओ को औकात बता दो

खुद ही गिरो दो किताबे,सर टकरा दो
फिर घबरा के दाँतो तले अंगुलियों दबा दो

मत उलझो सही गलत की गहरी तकरीरों में,
बाली उमर हैं बस आँख चुरा लो,

बहुत से हादसे सड़क किनारे भी हो जाते हैं,
जितना बचा सकते हो जफ़र खुदको बचा लो


7 comments:

  1. वाह्ह्ह....वाह्ह... बेहद शानदार...लाज़वाब लिखा है आपने..हर शेर उम्दा है..बधाई आपको इस बेहतरीन सृजन के लिए...👌👌

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  2. आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवार (13-08-2018) को "सावन की है तीज" (चर्चा अंक-3062) पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत खूब ...
    हर शेर नए अंदाज़ का ... दूर की बात कहता हुआ ... बहुत बधाई इन शेरो की ...

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  4. सुन्दर । किस्मत कर लें ।

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, डॉ॰ विक्रम साराभाई को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. इतनी रात को आपकी ये गजल पढ़ रहा हूँ

    आज की रात आगोश में हम तुम पिघल जाए
    सारी शर्म और बहानो को आग लगा दो

    ये शेर तो जैसे हम जबां हो मेरा।

    वाह वाह

    मेरे ब्लॉग पर स्वागत रहेगा आपका

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  7. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 14 अगस्त 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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