दर्द की तह में गुलज़ार बाक़ी है
मेरे ज़िगर में ख़ुशबू ए यार बाक़ी है
तुम मुझसे क्यों इतनी नज़दीकियाँ दिखाते हो
किसी शहर में मेरा हक़दार बाक़ी है,
डर लगता है इन नई हवाओं में
उस पुराने सज़र का दिल तलबगार बाक़ी है ,
यू तो अपने बीच अब कुछ बाक़ी ना रहा
दिल के किसी कोने में बस एक मिठास बाक़ी है,
आईने में वही चेहरा हर शक्स में अक्श तराशता हूँ
किसी तड़फ़ है ये कौनसी प्यास बाक़ी है,
सहबा उठ गये फ़ैसला माबूद हुआ
जाने क्यो दिल फिर भी उदास बाक़ी है ,

वाह
ReplyDeleteबेहतरीन
ReplyDeleteअत्यंत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति सर
ReplyDeleteस्मृतियां कितनी भी कंटीली हो
प्रेम का बंधन अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
सादर
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ११ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
कृपया ११ सितंबर पढ़े।
Deleteबेहतरीन शायरी
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