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Wednesday, 12 February 2025
ज़िंदगी कैसे हाथ से फिसल रही..
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जर्रा-जर्रा निकल रही साँझ ढले सूरज संग ढल रही भोर की तुषार धूप से फ़िघल रही ज़िंदगी कैसे हाथ से फिसल रही.. स्वप्न हुए ठेर है रेखाओ के सब फे...
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Saturday, 1 February 2025
पास आकर भी,रह गयीं थोड़ी दूरी थी
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मेरी क़िशमत थी या तेरी मजबूरी थी पास आकर भी,रह गयीं थोड़ी दूरी थी कुछ ना बोला मैंने तो बस गले लगा लिया माफ़ क़रदेना तो अब उसकी मज़बूरी थी ए...
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