Friday, 9 January 2026

"गोपाल"बनके ये महाभारत देखता हूँ..

 




सुबह शाम  रिश्तो की तिज़ारत देखता हूँ
"गोपाल"बनके ये महाभारत देखता 
हूँ


सच बरसो बरस एक सुनवाई को तरशता हैं
झूठ की चंद घंटों की जमानत देखता हूं


अपनी मुफ़्लिशि से जब मायूश हो जाता हूँ
शहर में तेरी  बुलंद इमारत देखता हूँ


अपने गम और दर्द बेमानी लगता हैं
जब दूसरे बंदों की शहादत देखता हूँ


सैकड़ो चिराग खुदही शर्म से बुझ जाते हैं
कुछ  अंधेरो की हिमायत देखता हूँ


हज़ार इंकलाब मुझी में मशाल उठाते हैं
जब मैं गांधी के उसूलो की ताकत देखता


बहुत दर्द मुझे पंछियो पेड़ो का महसूस हुआ
बस्ती बस्ती में फ़क़द आदमी की बसावट देखता हूँ