Friday, 8 November 2019

वो एक मुस्कुराहट से सारी समझदारी लूट जाते हैं...







चट्टाने टूट जाती हैं समुन्दर डूब जाते हैं
कभी-कभी वो भी हमसे तबियत पूछ जाते हैं,


बहुत दिनों बाद गाँव आया तो एहसास हुआ,
झुर्रियों में सब शिक़वे शिकायत छुप जाते हैं

बिजलियों की सजिश या बादलो की शरारत हैं,
मेरे पुश्तें  भरी बारिशो में ही टूट जाते हैं,

मैं सदियों ख़्वाहिशों अरमानो को तसल्ली देता हूँ,
वो एक मुस्कुराहट से सारी समझदारी लूट जाते हैं,


जब मैं चुप रहूँ तो नेक हूँ शरीफ़ हूँ वतनपरस्त हूँ,
जरा सा मुँह खो दु तो बड़े लोग रूठ जाते हैं....

4 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (०९-११ -२०१९ ) को "आज सुखद संयोग" (चर्चा अंक-३५१४) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    -अनीता सैनी

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  2. वाह बहुत सुंदर लिखा आपने

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  3. मैं सदियों ख्वाइशों अरमानों को... वाह। ये शेर मेरे पसंदीदा में एक हो गया है।
    जरा सा मुँह खोल दूं तो बड़े... कमाल है भई। वाह।

    कटु सत्य को प्यार से परोस दिया है।

    मेरी नई पोस्ट पर स्वागत है👉👉 जागृत आँख 

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  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.
    iwillrocknow.com

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