Sunday, 18 April 2021

तेरे घर से उड़ती हुई हवा आयीं है,









दर्द के शहर में दवा आयीं हैं,
तेरे घर से उड़ती हुई हवा आयीं है,

कैसी उम्मीद अब तो तस्व्वुर ज़िंदगानी है,
उम्र सारी जवानी,बचपन में ही लुटा आयी है

ये सजावट ये भीड़ सब बेरंग है,
जब तक महफ़िल में तू नही आई है,

जाते जाते हाथ छुड़ा कर कह गयी,
बाहर को लेने आज फिज़ा आयी है,

मैं तो कहता था इतने दूर मत जाओ,
मुँह छुपाना ही अब मर्ज की दवाई है,

10 comments:

  1. दर्द के शहर में दवा आयीं हैं,
    तेरे घर से उड़ती हुई हवा आयीं है,
    वाहहह जनाब।।।।।। बेहतरीन गजल।

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 21 अप्रैल 2021 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (२१-०४-२०२१) को 'प्रेम में होना' (चर्चा अंक ४०४३) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  4. बेहद उम्दा

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  5. बहुत खूब, मार्मिक गजल, सम सामयिक भी

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  6. वाह !! बहुत खूब, लाज़बाब गज़ल ,सादर नमन आपको

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  7. सुन्दर रचना

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  8. मैं तो कहता था इतने दूर मत जाओ,
    मुँह छुपाना ही अब मर्ज की दवाई है,
    बहुत सुन्दर रचना !

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