Monday, 20 August 2018

कितने करीब थे आज किस हद तक जुदा हैं...






कितने करीब थे आज किस हद तक जुदा हैं,
ना तुझको खबर है ना मुझे पता हैं...


जो सिर्फ आवाज़ से एहसास जान लेते थे
सुनाने को उनको अब चिल्लाना पड़ा हैं,

फ़ोन पे फ़क़द जुबा बोलती हैं और कान सुनते हैं
ऐसी गुफ्तगू से  ख़ाक मसला हल हुआ हैं,

तेरी बुलंदी तेरी हैसियत तमाम शहर पे हावी हैं
एक खत मैने भी तेरे बंगले में रख दिया हैं,

आदमी तन्हा घुट घुट के मर रहा हैं आज भी
जबके हर ओर क़यामत का काफिला हैं,

किसीने रात भर करवटे ही बस बदली हैं
अबके बरसात में ये घर कितना जला हैं,

लौट जाएंगे हम बस कुछ देर में खटखटाकर
तुमने कुंडी लगाकर जो कहना था कह दिया हैं,

कितनी मायूस और खामोश है ये मज़लिश
हमारा जुदा होना दुनिया पे कितना भारी पड़ा हैं...!!!

Saturday, 18 August 2018

जुबा तुम्हारी जबसे नश्तर हो गयी.....


















परेशां ज़िन्दगी किस कदर हो गयी
जुबा तुम्हारी जबसे नश्तर हो गयी,


ज़िंदगी  की दौड़ ने चेहरा  मेरा सुखा दिया
उम्र 30 में जाने कैसे सत्तर हो गयी,

एक दौर से जो आवारा थी देर रात तक,
नादानियां सुबह से आजकल दफ्तर हो गयी,

दूरिया तो फ़ोन पे मोम सी पिघलती  थी,
नज़दीकियां अकड़ कर पत्थर हो गयी,

मरकज़  भी बंदूक से मरहम लगाता हैं,
गोया समझदारी सारी "बस्तर"हो गयी,

तेरे आसमान से नज़र आए जर्रा ,मुमकिन नहीं
चिराग हू गुरुवत का,हैसियत तेरी अख्तर हो गयी,

अम्मा आज भी तड़के चूल्हे पे रोटियां पकाती हैं,
बहुये घुघट में ही सारी,अफसर हो गयी.......!!!