चिता की अग्नि में हर शाम मौन लेट जाता हूँ
मैं आज भी ऐसे तेरा वचन निभाता हूँ,
थक जाते हैं सब पुतले दिनभर की भेड़चल से,
मैं इस तडफ़ की अलख जगाता हूँ,
कोई सूरज अपने ताक़त में जब मग़रूर दिखा,
बहुत सादगी मैं उसको दिया दिखता हूँ
जमाने भर की जिलालत से तो लड़ भी लेता हूँ,
घर आकर तुम्हारे मसलों से हार जाता हूँ,
दुसरो की गलतियों में बहुत चीख़ता चिल्लाता हूँ,
अपनी गुस्ताखियों बड़े सऊर से पर्दे लगाता हूँ,
शौक से तुम जॉगिंग पर टहलने जाते हो,
एक ध्याड़ी मज़दूरी पर दिनभर पसीना बहाता हूँ,
तुम पत्थरो की बस्तियां बसाते हो,
मैं गाँव की काली मिट्टी से सोना उगाता हूँ
