फ़िज़ूल की बातों में सर अपना खपाते क्यो हो,
उलझने किसको नही इतना जताते क्यो हो,
गुमनामी के अंधेरो में खो जायूँगा कभी राख़ बनकर,
इतनी शिद्दत से मेरा नाम अपने साथ लिखवाते क्यो हो,
मुश्किल हैं मेरे साथ रहना मग़रूर बेकार हूँ मैं,
फिर नंम्बर बदल फोन की घण्टियाँ बजाते क्यो हो,
फिर नंम्बर बदल फोन की घण्टियाँ बजाते क्यो हो,
यहां भीड़ हैं गंदगी हैं लोगो को तहज़ीब नही,
इतना परेसा हो तो इन बस्तियों में आते क्यो हो,
इतना परेसा हो तो इन बस्तियों में आते क्यो हो,
गर कमज़ोर गरीबो मज़लूमो का कोई वजूद नही,
हमारे जुलूसों लाल सलामो से इतना डर जाते क्यो हो,
हमारे जुलूसों लाल सलामो से इतना डर जाते क्यो हो,
जानते हो,मसले मंदिरो मस्ज़िदों के कुछ नही देने वाले
फिर वोटरों को हर बार झुठ बहलाते क्यो हो,
फिर वोटरों को हर बार झुठ बहलाते क्यो हो,
जबके तुमने शहादत "आज़ाद "भगत की भी जाया की
मेरी क़लम से फिर इंक़लाब लिखाते क्यो हो.....!!!
मेरी क़लम से फिर इंक़लाब लिखाते क्यो हो.....!!!

