Sunday, 14 March 2021

मेरी बाहों में आ गयी एक चंचल बदली....









ओश सी चुप, धूप सी पतली,
मेरी बाहों में आ गयी एक चंचल बदली.
खुद में समा लूँ, तुझको में पा लूँ
तुझी पर गिरा दू ये भयभीत बिजली,
हृदय जो चितचोर है
क्षुब्द वादियों में यही शोर है,
अखियों की बातों में ध्यान दे,
कुछ इच्छायों को भी सम्मान दे,
दुनियादारी दूर रख,
जिया के पथ पर तन को जान दे,
प्रिय मिलन का जो एहसास है,
तनिक भी तुझे अगर विश्वास है,
रश्म की बस बेड़िया तोड़ दे,
शेष सब कठिनाई मुझे पर छोड़ दे,
दिखेगी ये दुनिया बहुत बदली-बदली,
मेरी बाहों में आ गयी एक चंचल बदली...

Saturday, 26 September 2020

एक किरण जो मेरी खिड़की से उतर आती हैं ....

 





मेरी खिड़की से उतरती हैं

मेरे फर्श पर छा जाती हैं

एक किरण रोज़

मेरे अँधेरे खा जाती हैं....


आसमान जब बाहे फैलता हैं

घना बादल जब आँखे दिखता हैं

देखती हैं ओटो के बीच से

कोई बच्चा देखे जो आँखे मीच के,

कभी अलसाये तो लाल हो,

चाँदनी गालो पे जब गुलाल हो,

ख़ामोश हो तो नीली हैं,

शामें नारंगी सी कभी पीली हैं

 वो फ़ूल पत्तो के आंसू पोछ दे,

नई रंगत उदास रातो को सुबह रोज़ दे

शामो को दुल्हन सा सुर्ख सजाती हैं

दिन में कपडों  से नमी  उड़ती हैं

 मज़दूरों संग पसीने भी बहती हैंं

सर्दियों में सौंधी धूप बन जाती है,

एक किरण जो मेरी खिड़की से उतर आती हैं ....