Saturday, 6 October 2018

धूर्त ही बिसात हो तो ,हौसले कैसे बरकरार रखे....!!!





कौरवो संग चौसर में कैसे धर्म को साध रखे
धूर्त ही बिसात हो तो ,हौसले कैसे बरकरार रखे,

माना आखेट के जंगल में चीख़ों का चक्रव्यूह भी हैं,
आँख ही न मींच ले तो कैसे जीवित स्वमं को व्याध रखें,

बस क्षण भर बिगुल ठहरा जरा मंत्रणा कर सकूँ
शीश तुम्हारे जो ना काट दे तो क्या खुद कंठ धार रखें,

गर मैं जो उठ खड़ा हुआँ,खेल सब दूंगा तुम्हारे उलट
धमनियों में रक्त के अश्व,जाने किस विधि बांध रखें,

बुझ जाती हैं जब चिता की आग भी सब स्वाहा करके,
किसी के लौटने की आस कोई कैसे आबाद रखें,

ये सन्नाटा और सूनापन एक दूरी जग से सहेज ली है,
जब नही निकट कोई क्या परस्पर संबंधों में गांठ रखे,

नीति नैतिकता सब बदल गये,कलयुगी विधान में,
अधर्म ही जब श्रेष्ठ हैं तो क्यो व्यर्थ क्षत्रीय तलवार रखें,

Friday, 5 October 2018

मुझसे यकीन बनकर तू लिपट क्यो नही जाता.....





ये ग़म का साग़र छलक क्यो नही जाता,
जाते जाते वो पलट क्यो नही जाता...


आँखों में तैरता हैं जो बदली बनकर,
उफान में टूटकर बाहों मैं बरस क्यो नही जाता,

हौसले अपने पानी चौमास से उफनते है,
वो रस्मो बंधिसो केे रास्ते से हट क्यो नही जाता,

मेरी रग-रग में तू ज़िन्दगी बनकर मौज़ूद हैं,
तुझे भुलाना है तो ये सिर कट क्यों नही जाता,

गर सचमे तुझे ख़ौफ हैं बेरहम आँधियों का,
मुझसे यकीन बनकर तू लिपट क्यो नही जाता,

वो मोहब्बत वो गर्म लहज़ा बाकी हैं अभी,
ये आँगन भाईयो के हिस्से बट क्यों नही जाता,

पैगामे उल्फ़त को दिल से लगा के रखते हैं सुबह-शाम ,
ये काग़ज़ का टुकड़ा जफ़र फट क्यों नही जाता....!!