कई बार जो जहर हम दोनों ने साथ-साथ पीया,
चंद रोज की अनबन में तुमने जमाने को उगल दिया..
बेकशी ने जैसे तैसे बेक़रारी को जब समझा लिया,
नया बहाना बनाकर उसने फिर इरादा बदल दिया,
आज भी अपने फैसले पे हरसू पछताता हूँ,
उस मोड़ पर क्यो हमने अपना रास्ता बदल दिया,
तुम्हारा गुस्सा तुम्हारे जज्बात पर हावी था,
भीगीं आँखों से मनाया और लाल से मचल दिया
सारा शहर अंधेरो के साया में पागल बना रहा,
झूठ ने बड़ी चालाकी ने अपना चाल चल दिया....!!!
चट्टाने टूट जाती हैं समुन्दर डूब जाते हैं
कभी-कभी वो भी हमसे तबियत पूछ जाते हैं,
बहुत दिनों बाद गाँव आया तो एहसास हुआ,
झुर्रियों में सब शिक़वे शिकायत छुप जाते हैं
बिजलियों की सजिश या बादलो की शरारत हैं,
मेरे पुश्तें भरी बारिशो में ही टूट जाते हैं,
मैं सदियों ख़्वाहिशों अरमानो को तसल्ली देता हूँ,
वो एक मुस्कुराहट से सारी समझदारी लूट जाते हैं,
जब मैं चुप रहूँ तो नेक हूँ शरीफ़ हूँ वतनपरस्त हूँ,
जरा सा मुँह खो दु तो बड़े लोग रूठ जाते हैं....