Sunday, 13 December 2015

एक कश्मकश सी दिल में पला करती हैं।

हैं कोई आग जो मुझमे जला  करती हैं,
एक कश्मकश सी दिल में पला करती हैं। 

बगियाँ फूल बहार  घनघोर घटाए,
तेरे आने की इत्तिला किया करती हैं।  

पेट की आग,दुनिया के सऊर सीखा देती हैं 
मज़बूरी पतली सी नटनी पे चला करती हैं

अमीरी हर शौक खरीद लेती हैं,
गरीबी  बस हाथ मला  करती हैं,

मुफ्त की एक चाय हमको हराम हैं, 
जबकि सिर्फ बेमानी तुमको फला करती हैं। 

Friday, 15 May 2015

काँटो की माला कितनी इस उपवन में अब भी बाकी हैं..


कितना दुःख,कितना व्योग इस जीवन मेंअब भी बाक़ी हैं
काँटो की माला कितनी इस उपवन में अब भी बाकी हैं..


गांव त्यागकर,माना हमने बस विसपान किया,
कुछ शीतलता किन्तु तेरे इस चन्दन में अब भी बाकी हैं

कोई कठिनता कोई कष्ट जीवन से पार नही हैं,
एक सरलता हर उलझन में मित्रो अब भी बाकी हैं.

उसकी ना में यू तो स्वप्न सारे स्वर्ग सिधार गये,
अमिट छवि सी,एक मन मंदिर में अब भी बाकी हैं

सिंदूर और श्रृंगार नया हैं,बातो का भी व्यवहार नया हैं,
मेरी कविता,पर तेरे कंगन की खनखन में अब भी बाकी हैं.....