Wednesday, 27 December 2017

बहुत नादान हैं ख्वाबो की तासीर ढूंढता हैं

जुल्फ ए फरेब में जंजीर ढूंढता हैं
बहुत नादान हैं ख्वाबो की तासीर ढूंढता हैं

गले भी मिलता है,रोजे भी रखता हैं
मगर कौन गरीब ईद में तकदीर ढूंढता हैं
तू क्यों परेशा हैं जमाने की बेरुखी से
यही ग़ालिब का भी मसला था यही मीर ढूंढता हैं
मुह बनाते हो,बगल से भी नही जाते
गरीब का बच्चा उसी कचड़े में अपनी तकदीर ढूंढता हैं

Thursday, 21 September 2017

किसी दिन अपने दिल की बात बता दू तो अच्छा हो

किसी दिन अपने दिल की बात बता दू तो अच्छा हो
फासले सारे एक साथ मिटा दू तो अच्छा हो

कितने सऊर से तुम हमसे चालाकी दिखाते हो
चंद रोज और ये राज दबा दू तो अच्छा हो
ये मुसीबते जो मुझे बर्बाद भी कर सकती हैं
गर इस तपिस में खुदको फौलाद बना लू तो अच्छा हो
जो जज़्बात तकलीफ के शिवा कुछ नही दे सकते
पुराने खातों को अब आग लगा दू तो अच्छा हो