Wednesday, 14 November 2018

बंद होके लिफाफे में,घर आ जाया तो करो .




रस्में ख़त कभी-कभी निभाया तो करो ,
बंद होके 
लिफ़ाफ़े में,घर आ जाया तो करो ...


ख़ुद ही सरका दो पह्लू ,हसीन जानो से,
घबरा कर फिर,दांतों तले ऊंगलिया दबाया तो करो .

हमको भी अपनी हदों का कुछ एहसास तो हो,
पास बुलाकर कभी आजमाया तो करो .

मैं तुम्हारा ,तुम मेरा सहारा हो तो सही,
शरमा कर कभी बाहों में पिघल जाया तो करो .

कौन कहता हैं यूँ न बदलेंगे हालात-ए-हाल,
दिल में क़भी इंक़लाब की शमा जलाया तो करो .

इतनी भी मुश्किल नहीं,बग़ावत और इंसाफ़ की ज़िद ,
तबीयत से कभी क़लम उठाया तो करो .

वक़्त का ये मरहम ,हर ज़ख़्म भर ही देता हैं ,
मेरे सिवा  कहीं दिल लगाया तो करो .
बंद होके लिफ़ाफ़े मेंं घर आ जाया तो करो .......

Thursday, 8 November 2018

पूजा की थाली तुलसी का पत्ता हैं माँ.....!!!






एक इबादत एक दुआ हैं माँ,
मेरी सारी मन्नते मेरा ख़ुदा है माँ,

हार जाती हैं जमाने भर की मुश्किले
हर उलझन को आसा हैं माँ,

क्यो सफ़ेद चादर तूने ओढ़ ली
अब्बा के बाद तुझे क्या हुआ हैं माँ,

पुरानी खटिया सी कोने पे लेती हुयी,
सिरहाने एक पीतल लोटा मोटा चश्मा है माँ,

दो आँख झुर्रियों से टकी लगायें रखे,
घर के हर शख्श के लिये परेशा हैं माँ,

ख़ास-खास कर जब कोई रात सो ना सके,
गुनगुना पानी और मुलेठी का टुकड़ा है माँ,

चार-आने आठ-आने के शहंशाह थे हम,
पापा से लड़कर दिलाती,वो छुट्टा हैं माँ,

तीज़ त्योहार रश्मो रिवाज़ की गठरी,
पूजा की थाली तुलसी का पत्ता हैं माँ,

चिता की आग़ मे जब रोशनी जल गयीं,
पता बहुत चला कि क्या है माँ,

तू तो कहती थी मरकर सितारा बनुगी
चाँद से पूछता रह गया काहाँ हैं माँ,




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