Thursday, 17 September 2020

तू जो मुझे ज़ी लेती थोड़ा,तो मर जाती...








ऐसे ना थे नसीब की ज़िंदगी सवर जाती,
यू न उजड़ती तो किसी और तरह उजड़ जाती..

ख़ून के से खूट पी ता रहा उम्र भर,
तू जो मुझे ज़ी लेती थोड़ा,तो मर जाती,

बादल,पँछी,फूल,फ़िज़ाये और मुस्कान तेरी,
बहार मेरे गाँव ना आती तो किधर जाती,

भूख़ से बिलखते रहे बच्चे रात भर,
दो दाने मिल जाते तो मज़बूरी घर जाती,

गरीब की कलम में जिंदा हैं लब्जो की सच्चाई,
दौलत का घुन लगता तो नज़्म सारी सड़ जाती .....

©dr. zafar

Sunday, 13 September 2020

दुश्मन अभी रात के भुलावे में हैं...








दुश्मन अभी रात के भुलावे में है,
ये सूरज अभी बादलों के साये में हैं,

ग्रहण की रोशनी तुम्हे अन्धा बना देगी,
ज़िन्दगी का जोड़ अभी घटाये में हैं,

ये तहज़ीब हैं जिसे कमज़ोरी समझते हो,
मेरा ज़मीर मेरे सब्र के संभाले में हैं,

मंत्री जी और साहब जोड़ तोड़ करते रहे,
कितनी देर और सुबह के उजाले में हैं,