Sunday, 13 December 2015

एक कश्मकश सी दिल में पला करती हैं।

हैं कोई आग जो मुझमे जला  करती हैं,
एक कश्मकश सी दिल में पला करती हैं। 

बगियाँ फूल बहार  घनघोर घटाए,
तेरे आने की इत्तिला किया करती हैं।  

पेट की आग,दुनिया के सऊर सीखा देती हैं 
मज़बूरी पतली सी नटनी पे चला करती हैं

अमीरी हर शौक खरीद लेती हैं,
गरीबी  बस हाथ मला  करती हैं,

मुफ्त की एक चाय हमको हराम हैं, 
जबकि सिर्फ बेमानी तुमको फला करती हैं। 

Friday, 15 May 2015

काँटो की माला कितनी इस उपवन में अब भी बाकी हैं..


कितना दुःख,कितना व्योग इस जीवन मेंअब भी बाक़ी हैं
काँटो की माला कितनी इस उपवन में अब भी बाकी हैं..


गांव त्यागकर,माना हमने बस विसपान किया,
कुछ शीतलता किन्तु तेरे इस चन्दन में अब भी बाकी हैं

कोई कठिनता कोई कष्ट जीवन से पार नही हैं,
एक सरलता हर उलझन में मित्रो अब भी बाकी हैं.

उसकी ना में यू तो स्वप्न सारे स्वर्ग सिधार गये,
अमिट छवि सी,एक मन मंदिर में अब भी बाकी हैं

सिंदूर और श्रृंगार नया हैं,बातो का भी व्यवहार नया हैं,
मेरी कविता,पर तेरे कंगन की खनखन में अब भी बाकी हैं.....

Monday, 4 May 2015

हालात से हारकर उम्मीद फिर रोने को हैं.....

राह विरान,दिल परेशान,पलके भिगोने को हैं,
हालात से हारकर उम्मीद फिर रोने को हैं.


रास्ते सख्त हैं,मुश्किल बड़ा वक़्त हैं,
ज़िन्दगी पाव खीच कर कफ़न बिछौने को हैं.

टूटती सांस,बेचैन धड़कने खामोश,
ताकते पस्त, हौसले भी कोने को हैं.

एक ही तशवीर में, क्या क्या दिखा दिया
रौशनी से भागकर आँख बस सोने को हैं.

कहा जाऊ किससे मिलू किससे बात करुँ,
ज़िन्दगी एक सी बोझ शामो सहर ढोने को हैं

तेरी सिसकियो में मैंने सब पद लिया
बात जो ना सुनी जो ना किसीसे कहने को हैं

सारे अरमान किताबो मैं दबके मर गए,
हमभी अपना वज़ूद पन्नों में कही खोने को हैं....

Wednesday, 8 April 2015

युही किसी शाम मैं ढल जायूँगा,

युही किसी शाम मैं ढल जायूँगा,
तेरी दुनिया से बहुत दूर निकल जायूँगा.


जो भी जी चाहे फिर जीभर के करना
अपने पीछे मैं तेरा नशीब बदल जायूँगा

चंद रोज़ करेगे ये लोग  रोना धोना,
धीरे धीरे मैं कब्र की मिटटी मे गल जायूँगा

तेरी हमदर्दी की खैरात मुझे मंज़ूर नही
अपने हालात से मैं खुद ही संभल जायूँगा

 यकींन का फरिश्ता,उम्मीद का सूरज हूँ
किसी आँख मे रात भर पल जायूँगा

आज की रात हैं क़यामत,फैसला करले,
मलाल तमाम उम्र का कल सुबह मल जायूँगा


Saturday, 28 March 2015

तेरी तश्वीर आँखों से नही उतारी ....

ज़माने की जिलालत  से हिम्मत नहीं हारी,
अब तक तेरी तस्वीर आँखों से नही उतारी


वो लोग और थे  जो दम तोड़ चुके हैं,
जीने की खिलाफत में जंग अब भी हैं जारी,

तुम हो की  ऊपर की हसी देख रहे हो,
दुनिया में तो हर फूल पर जुल्म हैं भारी,

उस एक मुलाकात  फल भोग रहा हूँ ,
तेरी यादें सीने में खिलती हुई फुलवारी ,

आप कभी खिदमद की ख़्वाहिश तो कीजिये,
कदमो में बिछा दूंगा में दौलत सारी ,

जैसे ही बेरहम गाड़ी ने स्टेशन छोड़ा,
काजल  भीगा गयी एक आँख कुवारी,

जी मार के जीना मैं भी सीख हूँ,
घुट घुट के मरी हैं कई उम्मीद बेचारी,

तेरा ख्याल करके कलम चलायी हैं,
कुछ अदावते मैंने कभी नही उतारी,

Friday, 20 March 2015

आखिर मुझमे मेरा क्या हैं...

आखिर मुझमे मेरा क्या हैं,
तुम लोगो की रश्मो रिवाजो
घुटन की जंजीरो में,
कशमकश की जद्दो जहद में
हाथो की खाली लकीरो में
ये करो ये ना करो की तकरीरों में
इन तशविरो में ताबिजो में
तुमने मेरा छोड़ा क्या हैं
आखिर मुझमे मेरा क्या हैं....

थोडा थोडा रोज़ कटता जाता हूँ
तुम्हारे मुताबिक बटता जाता हूँ
कैसी ओड़ी मज़बूरी हैं
बेचैन खुद,दुनिया में घुलती कस्तूरी हैं
बामुश्किल हैं बाधा खुदको
तुम्हारे ताबूतों में नापा खुदको
तुम्हारी सुनी तुम्हारी करी
मर गया हैं मुझमे मैं ही
तुमने ही ये जहर पिलाया,
पहरो में आवाज़ों को दबाया
फिर रोना धोना झूठ बनावटी घेरा क्या हैं
आखिर मुझमे मेरा क्या हैं......

मुझको मैं ही बनने देते,
गिरने देते लड़ने देते
ठोकरों  की चक्की में छनने देते
मुझको यु न बाधा होता,
पा लेता जो कुछ पाना होता
मंजिले सब अपनी बनांते,
परिंदे आसमानों में बेख़ौफ़ उड़ पाते
तुमने पिंजरा जो खोला होता
कफ़स ने अब जिन्दा छोड़ा क्या हैं
आखिर मुझमे मेरा क्या हैं......

Friday, 13 March 2015

मेरी निगाह को तेरा इंतज़ार अब तक हैं …

धड़कनो में दबा  हुआ सा गुबार अब तक हैं,
मेरी निगाह को तेरा इंतज़ार अब तक हैं  . 

गैर की बाहो में भी तुम मुझे भुला नही सकते ,
सदाओं में कशिश को वो धार  अब तक हैं  

एक रोज़ छुआ था दौरे तनहाई में,
बदन में खुशबु ए यार अब तक हैं 

यु ही मिल जाएगी तू किसी रोज़ उसी रोड पर,
नादान दिल को ये एतबार अब तक हैं 

जीता हूँ दुनिया के कई इम्तहानों में ,
गोया उस हार से हार अब तक हैं  . 

मुझसे पहले जो चोट खाये बैठे थे,
उनको जफ़र बुतो से करार अब तक हैं  ……। 

Sunday, 8 March 2015

मेरा इश्क़ तेरी बंदगी से बड़के हैं


मेरा इश्क़ तेरी बंदगी से बड़के हैं
जैसे राधा का रिश्ता रुक्मणी से बड़के हैं

मूर्छित हुआ जिसने प्रेम का अपमान किया
लछमन का क्रोध कब श्रद्धा सबरी से बड़के हैं

मेरे लबो से मिश्री अबतक घुली नही
अल्लाह उसके होठ चासनी से बड़के हैं

तेरे रुखसार पर एक बेचैनी तराशता देती हैंँ
मेरी नज़र भी जोहरी से बड़के है

तेरे शहर की रौनक शामें तु ही संभाल
मेरे खेत का कलेवा तेरी दाल मखनी से बड़के हैं


Wednesday, 4 March 2015

गले से लगा मगर आँख से उतर गया. .....

गले से लगा मगर आँख से उतर गया
तेरा एक फैसला कितने फासले कर गया

बात वो बात अब शायद कभी न हो
जहर तो जानेमन उमरभर को घुल गया

तू मेरा फक्र मेरा गुरुर था मेरे हमसफ़र
देखा जो तेरे हौसले मैँ डर गया

कुछ परिंदे कभी लौट कर नही आये,
दूध सी ज़िन्दगी में,एक बूद जो खट्टा पड़ गया

घर का वीराना उसे तलाश करता हैं
पायलों को झनझन में सन्नाटे जो भर गया

दफ्तरो में ताले लगे हैं रास्ते सुनसान हैं
सुना हैं कल कोई इंसानियत का क़त्ल कर गया


Thursday, 26 February 2015

ज़िन्दगी आग हैं पानी डालते रहिये...

ज़िन्दगी आग हैं पानी डालते रहिये
हर मोड़ पर दिल का सिक्का उछालते रहिये

दिखने लगी हैं नमी,हसींन आँखों में
अल्लाह उसका काजल सँभालते रहिये

  धड़कने बेजान हैं बेचैन रातो को
हर सुबह मुर्दो में जान डालते रहिये

टूट कर वो बाहों में पिघल जायेगा
दिल में ये ख्वाब पालते रहिये

 कुछ दिनों में हम जिद छोड़ ही देगे
 आप बस बात टालते रहिये

चाँद की जुर्रत नही की टिक पाये
 चांदिनी रात में धीरे धीरे घूँघट निकालते रहिये

एक रोज़ मैं लौटूंगा सगुन का सिक्का लेके
आप हाथो की मेहँदी संभालते रहिये

तुम्हारे ख्वाबो की ईमारत बहुत बुलंद हैं
तेज़ धुप में अभी पत्थर निकलते रहिये






Sunday, 22 February 2015

जहर हूँ जिसने पीया पछताया ......

दर्द ही दर्द मेरे दामन में लिपटा पाया
मैं जहर हूँ जिसने पीया पछताया

ये एहसास ये ज़ज़्बात कबके जाया हुए
तुमने लाश के माथे पर सिन्दूर लगाया

कौन कहता हैं हौसले तकदीर के मोहताज़ नही
कारवां छोड़ कर सारा उसने मेरी कश्ती डुबाया

दिल के पते पर अब कोई नही रहता
आज फिर एक ख़त लौट आया

बड़े लोगो की मजबूरिया हुआ करती हैं
मुझे तन्हाई में अपनाया महफ़िलो में ठुकराया

निचोड़ कर तमाम ज़हर कोई विषपान करे
ज़िन्दगी की धुप में मिल जाय एक साया ......

Thursday, 19 February 2015

हर सुबह मैं अपने साथ नही रहता ...


कैसे गुजरी रात,याद नही रहता ,
हर सुबह मैं अपने साथ नही रहता ...

कुछ ख्याल आकर ख्वाबो को सजाते हैं ,
सोये हुये मैं कभी बर्बाद नही रहता ...

तेरे शहर में ये कौन सा मौसम हुआ करता हैं ,
तुम्हारे खतो में कभी जज्बात नही रहता ....

अपने ही आजकल जख्म दिया करते हैं ,
सब मुश्किलों में,दुश्मनों का हाथ नही रहता ...

दम तोड़ देगा इश्क मौलवियों पडितो के झगडे में ,
मज़हबो का मसला उसके दरबार नही रहता ...

कहते कहते कुछ  जफ़र रुक सा जाता हैं
जब दिल गिरफ्तार हो तो जुबा आजाद नही रहता  .....

Thursday, 12 February 2015

एक उम्र हम इसी कफ़स में थे ....

एक उम्र हम इसी कफ़स में थे,
जबसे हम तेरी हिफ़ज़ में थे.

सारा शहर रुख़सार का था कायल,
तुम  कब मेरे वश में थे  .

खुशिया तमाम गुलाम थी 
कुछ फ़रिश्ते मेरी गिरफ्त में थे  . 

चाँद मेरे हदो में था 
परवाने कभी अपनी जब्त में थे 

दौरे तन्हाई दर्दे इश्क़ दिखावा हैं 
कितने मज़े तुमसे शिख्शत में थे 

उतनी ताकत तुम्हारे जुल्म में कहा थी 
जितने हौसले जिदे बेबस में थे 

कुछ कहना उस वक़्त फ़िज़ूल था 
जाते हुए तुम दौलत की हवस में थे 

Saturday, 7 February 2015

तुम मुझे भूल जाओ,मुझे तुमको भुलाने दो.

काँच के खिलोनो को अब टूट जाने दो,
तुम मुझे भूल जाओ,मुझे तुमको भुलाने दो.


खूब देखी हमने चाँद सितारों की दुनिया ,
मुझे जमीन पर कुछ मोती उगाने दो.

क्या जरुरी हैं मुझे बाँहो में भरो
टूटता तारा हूँ मुझे टिमटिमाने दो

यु ही ज़िन्दगी बोझिल हो चुकी मेरी
कपकपाती लौ को बुझ जाने दो

बहारो के उतरने पर अफशोस नही करते
गुलशन के रखवालो को अपनी चलाने दो

देख तो लिया उम्र भर मर मर के
आज मुझे सारी दीवारे गिराने दो

ये अल्फ़ाज़ कही आग न लगा दे दुनिया में
इन नज्मो को गुमनामी में खो जाने दो...


Wednesday, 4 February 2015

परदेश में यू ना किसी की बसर हो....

परदेश में यू ना किसी की बसर हो
ना पेट को रोटी ना रहने को घर हो

 जिस तरह भटकता हूँ आजकल
जिंदगी किसीकी ना दरबदर हो
सुना हैं मुस्करा कर भी मिलता हैं
हम पर भी कभी इनायतें नज़र हो
जिंदा रहने का बस यही उसूल हैं
जुबान जहर दिल फकद पत्थर हो
दीवारे कब घर हुआ करती हैं
रहने वाले भी कुछ मय्यसर हो
उसके रुखसार पर राधा की सी झलक
जाने कब ये दिल मुरलीधर हो

Sunday, 1 February 2015

बदनसीब आँखों ने दुनिया बेइंतेहा देखी..

हसी पनाह देखी दर्द भरी आह देखी
बदनसीब आँखों ने दुनिया बेइंतेहा देखी..

रातभर अपने अपने हिस्से के बिस्तर में सिमटते रहे
देखने वालो ने हमारी दुरिया कहा देखी.

फकद मुर्दो की भीड़ में कैद हैं ज़िन्दगी
आज के इंसा ने आदमियत कहा देखी.

तेरे मेरे दरमियान फासले लाज़मी थे
तूने अपनी ज़रूरते देखी हमने तेरी जुबा देखी

बड़े सलीके से उसने दुनियादारी पहन ली
वही सूरत हमने तो हर जगह देखी

हुस्न लैला ने मजनू को किया बदनाम
इश्क़ मीरा जिसने जहर मैं भी दवा देखी

Tuesday, 27 January 2015

दर बदर भटकता रहा जिसकी तलाश में.....

दर बदर भटकता रहा जिसकी तलाश में
 पाया है वही सुकून तुम्हारे पास मे

तेरी तिशनगी को मोहब्बत समझता रहा
कच्चा हु आज भी दुनिया के हिसाब मे

बहुत मगरूर हो चला हैं मेरी मज़बूरियों में  ,
देखता हूँ तुम्हारा कल मैं अपने आज में 

तमाम तडफ तमाम मुश्किलें बेमानी मालूम पड़ी ,
कल रात जो तुम मिले पुराने ख्वाब में 

इस एक एहसास से सारे कयास बदल दिए
कल के खुदा बिक गये जफ़र पहली नमाज़ में.......