Sunday, 9 December 2018

मेरी हसरतो को कुचलकर शहनाईयां बजाना..







चाँद दिखाये मीरा तुम ज़हर पिलाना,
मेरी हसरतो को कुचलकर शहनाईयां बजाना..


अपने अंजाम में कुछ रोमानियत तो हो,
हल्दी के हाथ से सज धज तुम मेरा गला दबाना,

तुम तब भी मजबूर थी,अब भी मजबूरिया रही होगी
मतलब निकल जाये तो तुम फ़ोन भी मत उठाना,

मैं चुप चट्टान बनके समुन्दर के थपेड़े झेल लूंगा,
लोगो को जा जा के तुम अपने अश्क दिखाना,

चाहे अपने रिश्ते में कितनी गाँठे बँधी रही,
बहुत ईमानदारी से मग़र बेवफ़ाई निभाना,

रंग बदलकर क्या खूब जुबान बदली हैं,
क़यामत हैं उसका यूँ खुदको बेकसूर बताना,

आजकी शाम साक़ी ने कसम खिलाई हैं,
पीयू न पीयू मगरचे जरूरी हैं जाम में आंसू मिलना,

टूट भी जाऊ चाहे बर्बाद इस राश्ते पर होउ,
कुफ्र हैं जफ़र उसको कभी ग़लत बताना,

Thursday, 6 December 2018

शाम से दिल में सुलग रहा कोई....!!!






शाम से दिल में सुलग रहा कोई,
बुझती हुई लकड़ियों में पक रहा कोई,


हज़ार बार उम्मीद दम तोड़ती रही हैं,
फिरभी दस्तक पर सज रहा कोई,

यू तो कबसे रोना शिश्कना छोड़ चुका हूं,
मेरे सब्र को बेसब्री से तक रहा कोई,

ग़ज़ब की बेचैनी और दूर तक हैं सन्नाटा,
और शर्मा के मेरी बाँहों में सिमट रहा कोई,

जबके खुदको तेरे मुताबिक़ बना लिया हैं,
अपनी बातो से ही पीछे हट रहा कोई,

कोई आरज़ू न कोई ख्वाहिश हैं बाकी,
फिर भी उम्मीद बनकर दिल में बस रहा कोई,

Thursday, 29 November 2018

तेज़ बारिस थी धूप मुह दिखाने लगी....!!!










तेज़ बारिस थी धूप मुह दिखाने लगी,
चुनाव नजदीक है शायद,अयोध्या याद आने लगी,


बमुश्किल इस कौम को अंधेरो से निकाला था,
एक भीड़ फिर सच को जुठ बताने लगी,

मुददत बाद जब शाम को घर वक़्त पे चला गया,
गले लगा लिया माँ ने और आँख छलछलाने लगी,

दर्द में डूब कर जीना सीख ही लिया था गोया,
ज़िंदगी करवट बदल कर हँसाने लगी,

अपने लहू से सीच कर मैंने सज़र जवान किया,
फल जब पक गया दुनिया हक़ जताने लगी,

खुदही तुम्ही ने एक दीवाने की मजनू किया,
आशिक़ की सदा को दुनिया फिर पत्थर दिखाने लगी,

तुम नादान हो उलझे रहो जमाने की दौड़ भाग में,
एक अफसरा मुझे आजकल नई दुनिया दिखाने लगी,

तमाम रात एक फ़रिश्ते से जिरह करता रहा,
वो कली घबराकर तकिये पर ऑंसू बिछाने लगी,


Monday, 19 November 2018

चिता की आग में जल रहा हूँ मैं ......






चिता की आग में जल रहा हूँ मैं ,
तेरे मिलने को मचल रहा हूँ मैं ,



एक रोज़ कभी मिली थी फूलो की सेज़,
जबकि रोज़ काँटों पर चल रहा हूँ मैं ,

हर बात तेरी नसीब समझकर मानता  रहा,
तेरे लिए कितना बदल रहा हूँ मैं,

ये बेबसी ये कमजोरी हर चेहरे मे ज़ाहिर हैं,
थोड़ा थोड़ा हर शख्श मे  पल रहा हूँ मैं 

हर बार पछता कर फिर तुझपे यकीन करता हूँ,
कैसे कह दूँ ठोकरों से संभल रहा हूँ मैं ,

तीज -त्यौहार अब नादानी पिछड़ापन लगते हैं,
शहर आके पत्थर में बदल रहा हूँ मैं,

लो आ गया इलेक्शन वादों इरादों का दौर,
जुबाने ज़हर की केचुली बदल रहा मैं ......... !!!




चित्र गूगल आभार

Wednesday, 14 November 2018

बंद होके लिफाफे में,घर आ जाया तो करो .




रस्में ख़त कभी-कभी निभाया तो करो ,
बंद होके 
लिफ़ाफ़े में,घर आ जाया तो करो ...


ख़ुद ही सरका दो पह्लू ,हसीन जानो से,
घबरा कर फिर,दांतों तले ऊंगलिया दबाया तो करो .

हमको भी अपनी हदों का कुछ एहसास तो हो,
पास बुलाकर कभी आजमाया तो करो .

मैं तुम्हारा ,तुम मेरा सहारा हो तो सही,
शरमा कर कभी बाहों में पिघल जाया तो करो .

कौन कहता हैं यूँ न बदलेंगे हालात-ए-हाल,
दिल में क़भी इंक़लाब की शमा जलाया तो करो .

इतनी भी मुश्किल नहीं,बग़ावत और इंसाफ़ की ज़िद ,
तबीयत से कभी क़लम उठाया तो करो .

वक़्त का ये मरहम ,हर ज़ख़्म भर ही देता हैं ,
मेरे सिवा  कहीं दिल लगाया तो करो .
बंद होके लिफ़ाफ़े मेंं घर आ जाया तो करो .......

Thursday, 8 November 2018

पूजा की थाली तुलसी का पत्ता हैं माँ.....!!!






एक इबादत एक दुआ हैं माँ,
मेरी सारी मन्नते मेरा ख़ुदा है माँ,

हार जाती हैं जमाने भर की मुश्किले
हर उलझन को आसा हैं माँ,

क्यो सफ़ेद चादर तूने ओढ़ ली
अब्बा के बाद तुझे क्या हुआ हैं माँ,

पुरानी खटिया सी कोने पे लेती हुयी,
सिरहाने एक पीतल लोटा मोटा चश्मा है माँ,

दो आँख झुर्रियों से टकी लगायें रखे,
घर के हर शख्श के लिये परेशा हैं माँ,

ख़ास-खास कर जब कोई रात सो ना सके,
गुनगुना पानी और मुलेठी का टुकड़ा है माँ,

चार-आने आठ-आने के शहंशाह थे हम,
पापा से लड़कर दिलाती,वो छुट्टा हैं माँ,

तीज़ त्योहार रश्मो रिवाज़ की गठरी,
पूजा की थाली तुलसी का पत्ता हैं माँ,

चिता की आग़ मे जब रोशनी जल गयीं,
पता बहुत चला कि क्या है माँ,

तू तो कहती थी मरकर सितारा बनुगी
चाँद से पूछता रह गया काहाँ हैं माँ,




Link to sahityapediya-

https://hindi.sahityapedia.com/?p=101238

Saturday, 3 November 2018

चाँदनी नीली रात फिर उफ़ान पे है.....



जो तेरा ज़िक्र  मेरी जुबान पे हैं 
चाँदनी नीली रात फिर उफ़ान पे है .. . !!!


एक बार जो वो गुलबदन गुज़रा था यां से,
उसकी खुशबु कबसे मेरे मकान पे है ,

आज फ़िर वो सज सवर के घर से निकला हैं ,
आज फ़िर  मेरा सब्र इम्तेहान पे है ,

काश के वो थाम ले आकर मुझ को,
मेरी निग़ाह  कबसे इस एहसान पे है,

तीखे नैन,काजल चढ़ा के नज़र मिलाते हैं,
सम्भालो दीवानो तीर कमान पे है,

फ़क़द एक दो रोज़ का जिक्र नहीं,
ये मुसीबत तो मेरे जिस्मोजांन पे है,

गाँव में  चाँद ने करवट बदली होगी ,
बेचैनी मेरी क्यों ये परवान पे है ,

मिलकर निगाह ,फेर लेता है,
कितना खुश वो अपनी शान से है,

तुझे देखकर कभी-कभी यु भी महसूंस हुआ,
शायद मेरी नज़र आसमान पे है....... !!!










Thursday, 1 November 2018

बैठ के सुबह शाम को मैं लिखता रहा ,


 
 
बैठ के सुबह शाम को,मैं लिखता रहा ,
ख़त एक अन्जान को मैं लिखता रहा .


नीद कम आंख नम होने लगी ,
फिर भी ख्याल गुमनाम को मैं लिखता रहा ....

और भी शै हैं मैंने जाना नही,
सिर्फ तेरी मुस्कान को मैं लिखता रहा ...

जब जब तुमको देखा सोचा किया ,
एक नज़्म तेरे सलाम को  मैं लिखता रहा ...

हाले दिल तो कुछ तुमसे कह ना सका ,
ख़त में अपनी जुबान को मैं लिखता रहा ...

लाश में मेरी जिन्दा तू रह गयी,
बात ये रोज़,शमशान को मैं लिखता रहा ...

अंजाम मोहब्बत का नज़र आ रहा ,
जाने क्यों मौत के सामान को मैं लिखता रहा ...




चित्र गूगल आभार

Saturday, 27 October 2018

बर्तन माझती कुम्हारिन के हुस्न पर ग़रीबी हावी हैं..!!!






किसी की आँख  हैं पीली किसीकी आँखे गुलाबी हैं,
बर्तन माझती कुम्हारिन के हुस्न पर ग़रीबी हावी हैं..!!!


प्रेम की दीपक तुमने हज़ारो किताबो में जला रखे,
मुफलिशी और भूख को मैंने कलाम अपनी चढ़ादी हैं,

तुम खुश हो तुम्हारी नीतियों भीड़ इतनी जुटा दी हैं
ये भोली जनता तो बस हेलीकाप्टर देखने आती हैं,

हम कलेजे से लगाते हैं वो सिर चढ़ के आता हैं,
मंत्री जी की जेब में ख़तरे में अपनी आजादी हैं,

ना कोई आराम देखा,पूड़िया दवाई की नही खायीं,
उस चूल्हे की रोटी,मिट्टी के घरों में ताक़त फ़ौलादी हैं,

हाँथों मे मज़दूरी के छाले हैं जुबा पे मज़बूरी के ताले हैं,
तुम्हारे कारखानों में,कितनी जवानी हमने दबा दी हैं,

पाप था पिछले जन्म का चमहारिन की कोख ने जना था,
वरना इन मासूम बच्चे ने  ख़ाक कोई खता की हैं,

उसी डाल पर थी कोयल जिसपर फाँसी पे छुला था,
तुम्हें खबर मेरी मौत की भी मिठी सुनाई दी हैं,

मेरे हाथ हथोड़े हैं मेरे घर में सुकून की नींद आती हैं,
शहर में नींदे  भी तुमने दवा के भरोसे लुटा दी हैं,

मैं पाँव जो छू लू उसके वो माथा चुम लेता हैं,
इतनी तहज़ीब तो जफ़र मेरे गाँव के बुज़ुर्गो में बाक़ी हैं...!!!

Saturday, 20 October 2018

वजह की ज़िद में ज़िन्दगी का मज़ा नही ले पायेगा......!!!




ज़ुनून जब तेरा हद से गुज़र जाएगा,
वजह मे फसेगा तो सारा खेल बिगड़ जायेगा,


इस कसमकश की वजह भी तभी जान पायेगा,
दुनिया की तमाम वजहों से जब फ़रिक हो जायेगा,

बारिशो में भीग कर देख,तेज़ धूम में घूमकर आ,
वजह की ज़िद में ज़िन्दगी का मज़ा नही ले पायेगा,

ये हालात तेरे ही फैसलों के हासिल हैं,
बेवजह,वजह की बहस के पीछे कबतक चेहरा छुपायेगा,

इतनी प्यास हैं कि अब बुझाने से डरता हूँ,
नकाब उठ गया तो तस्व्वुर कमज़ोर पड़ जायेगा,

ताब को इस क़दर दीवानों ने खुदा कर दिया,
एक बार गले लगा ले चालीस पचास बरस तो कट जायेगा,

बैठ कर कई रात मैं इस फ़लसफ़े को गूँधता रहा,
सुन अब वो किस्सा तुझे भी यक़ीन नही आयेगा,

गुप अंधेरा होगा,रास्ता भी रास्ते से हट जयेगा,
सब्र रखना तुझे सच तब ही नज़र आएगा,

जिदों की कोख़ में दूरियों के समुन्दर हैं,
सोच समझ कर अकड़ना वरना बहुत पछतायेगा,

चाँद जब  बाहों से उतरकर,दुनियादारी में खो जयेगा
जमी का बोझ सारा तेरे क़दमो में आ जायेगा,

पत्थर पिघल कर रास्ता दिखायेगा,आसमा खुल जायेगा,
कोई मीरा को जब जब जहर का घूट पिलायेगा....!!!

Monday, 15 October 2018

कितने राज कल रात दफ़न हो गये....







सारी शिकायते सारे शिक़वे ख़त्म हो गये,
कितने राज कल रात दफ़न हो गये,


बड़े बेक़रार लोग भटकते रहे थे कई रोज़,
सारे मसाइल मसले लिपट कर कफ़न हो गये,

हज़ार बार की मिन्नतों से जो भी अब नही पिघलते,
हम तुम बिछड़कर कितने सख्त हो गये,

दुःख तकलीफ़ मज़बूरी किसीकी नही दिखती,
भीड़ के जुनून में लोग इतने मगन हो गये,

झूठी खुशी और नकाबपोशों की ये महफ़िल हैं
अमीरे शहर के फ़ीके हर जश्न हो गये,

हाथ में फूल लेके अब कोई नही आता,
इस शहर में बस नफरतो के स्वपन हो गये,

जबके दिल तो बेरंग उदास हुए जाता हैं
जुदा हुए तो कितनी जल्दी रंगीन ये बदन हो गये,

पहली नवरात सुबह छत पे बाल सुखाते दिख गयी,
हमे भी अपने खुदा के दर्शन हो गये,

कितनी सिद्दत से जिस इश्क़ को हमने जवान किया,
तुम यू बदले की वो किस्से अब बचपन हो गये,

लोग बाज़ारो दरगाहों पे इशारो से जफ़र दिखाते हैं,
ऐसे बर्बाद हुये की शहर भर को उदाहरण हो गये...!!!

Wednesday, 10 October 2018

मुझसे हो नही पाया तुम कर नही सकते.....








जख्म ये उम्र भर तुम भर नही सकते
मुझसे हो नही पाया तुम कर नही सकते,


छोड़ कर हाथ,तुमने दरिया मोड़ तो दिया हैं
डूब तो सकते हो तुम इसमे तर नही सकते,

कुछ हौसला कुछ हिम्मते तुमभी दिखानी होगी,
हर बार तो श्रीकृष्ण अंगुली पे गोवर्धन धर नही सकते,

हुस्न जब बेवफा हो जाय तो मासूमियत खो ही देता हैं,
उस सादगी से तुम आँख में काजल कर नही सकते ,

हो जब दिल में दरिया तो आँख में छीटे आ ही जाने हैं,
कुदरत के उसूलो से इतना भी तुम लड़ नही सकते,

जैसे एक उम्र हमने साथमे एक ही दास्तान लिखी थी
इस तस्सवुर से किसी की मोहब्बत में तुम पड़ नही सकते,

जो कमसिन उम्र ने बड़ी नज़ाकत से फूल खिलाया था
फरिश्ते भी उसे अब लेकर वापस कर नही सकते,


सौ कोशिस करो हज़ार गले लगाओ लाख उम्मीद पालो,
मिल तो सकते हैं हम,जानेमन अब जुड़ नही सकते,

Saturday, 6 October 2018

धूर्त ही बिसात हो तो ,हौसले कैसे बरकरार रखे....!!!





कौरवो संग चौसर में कैसे धर्म को साध रखे
धूर्त ही बिसात हो तो ,हौसले कैसे बरकरार रखे,

माना आखेट के जंगल में चीख़ों का चक्रव्यूह भी हैं,
आँख ही न मींच ले तो कैसे जीवित स्वमं को व्याध रखें,

बस क्षण भर बिगुल ठहरा जरा मंत्रणा कर सकूँ
शीश तुम्हारे जो ना काट दे तो क्या खुद कंठ धार रखें,

गर मैं जो उठ खड़ा हुआँ,खेल सब दूंगा तुम्हारे उलट
धमनियों में रक्त के अश्व,जाने किस विधि बांध रखें,

बुझ जाती हैं जब चिता की आग भी सब स्वाहा करके,
किसी के लौटने की आस कोई कैसे आबाद रखें,

ये सन्नाटा और सूनापन एक दूरी जग से सहेज ली है,
जब नही निकट कोई क्या परस्पर संबंधों में गांठ रखे,

नीति नैतिकता सब बदल गये,कलयुगी विधान में,
अधर्म ही जब श्रेष्ठ हैं तो क्यो व्यर्थ क्षत्रीय तलवार रखें,

Friday, 5 October 2018

मुझसे यकीन बनकर तू लिपट क्यो नही जाता.....





ये ग़म का साग़र छलक क्यो नही जाता,
जाते जाते वो पलट क्यो नही जाता...


आँखों में तैरता हैं जो बदली बनकर,
उफान में टूटकर बाहों मैं बरस क्यो नही जाता,

हौसले अपने पानी चौमास से उफनते है,
वो रस्मो बंधिसो केे रास्ते से हट क्यो नही जाता,

मेरी रग-रग में तू ज़िन्दगी बनकर मौज़ूद हैं,
तुझे भुलाना है तो ये सिर कट क्यों नही जाता,

गर सचमे तुझे ख़ौफ हैं बेरहम आँधियों का,
मुझसे यकीन बनकर तू लिपट क्यो नही जाता,

वो मोहब्बत वो गर्म लहज़ा बाकी हैं अभी,
ये आँगन भाईयो के हिस्से बट क्यों नही जाता,

पैगामे उल्फ़त को दिल से लगा के रखते हैं सुबह-शाम ,
ये काग़ज़ का टुकड़ा जफ़र फट क्यों नही जाता....!!

Saturday, 29 September 2018

कोई मीरा अभी ये कंहा जान पायी हैं...




मैं ये कैसे कह दूँ गुलशन में बहार आयी हैं,
इन अंधेरों ने तो सौ ऑंख रात रुलाई है,


हर प्याला हर महफ़िल फ़क़त ज़हर का घूँट यहाँ,
गोया कोई मीरा अभी ये कहाँ जान पायी है,

ग़ज़ब इत्तेफ़ाक़ है कमाल की परेशानी है,
जिस-जिस को चाबी दी उसीने घर पे सेंध लगायी हैं

धीरे-धीरे सिख पाओगे धीरे-धीरे ग़र्द सफ़ा होगी,
अभी तो तुमने पहले-पहल चोट खायीं है,

घर छूटा,संसार छूटा,बैठा हूँ तन्हाई में,
तेरे इस इश्क़ में जानम,और कितनी तबाही हैं,

शोलों पर चलकर मैंने जीना सीख़ जो लिया हैं,
देखो दुनिया में,अब मेरी कितनी वाह वा ही हैं,

आँख मेरी बहता दरिया,दिल ज़ज़्बातों का  समुन्दर है,
मैं इतना अमीर हुआ हूँ ,कैसे कह दूँ सनम हरजाई है,

एक चेहरा दुनियादारी को, रोज़ सुबह चुप ओढ़ लिया,
कई काली राते मैंने सुबह-सुबह ही बस दफ़नाई हैं,

 ग़र जुदाअंजाम थे इतने  तो मिलना ही क्यो था
तुमने जहा से किस्मत लिखाई थी मैंने वही से मिटायी हैं,

Thursday, 27 September 2018

क्या मै तुम्हारे तरीके सीख पाऊँगा.....???

















कोरा ही चला था सफ़र पर
जैसे जैसे लोग मिले अपना अपना रंग छोड़  गये ,
अपने हिसाब से ही तोड़  -मरोड़ गये
अपने तज़ुर्बो को तुम्ही ने लगाया ,
तुम्ही ने हिंदू और मुसलवां बनाया
किसीने अछूत कहा किसीने शीश छुक़ाया
मैं तो बेजुबान बेहद मासूम -नादान था
नन्हा सा एक कमज़ोर जान था
तुम्हरी अगुलियां पकड़ के चला
तुम्हरे लब्जो जुबान में ढला,
साफ सफेद कागज़ पे तुमने ही  ये रंग गड़ा
जिसने जैसा जितना कहा वैसा चढ़ा,
बदल के शख्शियत मेरी अब तुम्हे परहेज़ हैं
मेरे हर रूप का जबके तू ही रंगरेज़ हैं
फिर क्या इस कसमकस से मैं जीत  पाऊँगा
तन्हाई में रोऊंगा,महफ़िल में गा
ऊँगा
तुम्हारे सामने जूठे चेहरे बनाऊँगा
बेबात हस दूंगा,अपना गुस्सा दबाऊंगा
क्या मै तुम्हारे तरीके सीख पाऊँगा....

जो बन गया हूँ  ये तुम्हारा दिया अंजाम हैं,
इंसा तो पैदाइशी फ़क़द इंसान हैं
तुम्ही उसे बंदिशों दायरों में नापते हो,
धर्मों जातियों में काटते हो,
इन्ही कायदों में जो घुले वही शरीफ हैं,
क्या यही तुम्हारी तौफ़ीक़ हैं
जफ़र क्या तू भी युही जाया होगा
दुसरो का ढाला उनका का बनाया होगा
टूट जायूँगा मै भी या
अपने मुताबिक जहांन बनायुगा
क्या मै तुम्हारे तरीके सीख पाऊँगा....

तुम्हारे सही को बस सही कहूंगा
जहा कहोगे बस वही रहूंगा
तुम्हारे रास्तो से जायूँगा
तुम्हारी छाँव में बैठूँगा
तुम्हारे आसमानो मैं ही उड़ूगा
तुम्हारे दायरों मैं लिखूँगा
इसी तौर से जीऊँगा
इसी तरीखे से बीत जायूँगा
क्या मै तुम्हारे तरीके कभी सचमें  सीख पाऊँगा.......!!!

Monday, 24 September 2018

ये दो कमरे जो कभी घर न बन सके....



प्यार बहुत करते थे मगर हमसफर न बन सके,
ये दो कमरे जो कभी घर न बन सके,


यही था दोनो का फैसला तो सिर फोड़ना कैसा,
जो नही था तकदीर में,वो उमर भर न बन सके,

लाख चाहा आँख चुरा लू ज़माने भर की बेकारी से,
ग़रीब का हशर देख के पत्थर न बन सके,

ग़ज़ल की ख़ाक में ही दबे रहे सैकड़ो जंगी,
कई इंक़लाब मेरे ग़दर न बन सके,

चिता की सी आग में लेटे रहे दोनो रात भर,
अना के पत्थर टूट कर सुकू के बिस्तर न बन सके,

ये दुनिया की साजिश थी,मुक़द्दर की कमज़ोरी,
अपनी ज़िंदगी में कभी खुशी के मंज़र न बन सके,

Thursday, 20 September 2018

तृष्णा का उपचार क्या हैं...?








कौन सी पिपासा है कौन धुन सवार है,
मनुष्य को ये किसकी तलाश हैं
धन की धुरी पर चलता जीवन,
मृत तृष्णा  सा छलता जीवन
लक्ष्य कोई नही बस एक दौड़ जारी हैं
सब सिर एक बोझ भारी हैं
परस्पर संबंधो की किसको चिंता
ट्विटर व्हाट्सएप्प से ही जिंदा
इस भौतिकता का आधार क्या हैं?
वासना और तृष्णा का उपचार क्या हैं..?

चक्की के पाटो संग पिसते,
उसूल आदर्श कहाँ अब टिकते,
स्वमं स्वार्थ के साधन सब है,
एक उल्लू  से वाहन सब हैं
जो करे सब वही हैं करना,
सीमाओं से क्या अब झगड़ना,
सोचता हूँ अकसर
इस बाधाओँ के पार क्या हैं?
वासना और तृष्णा का उपचार क्या हैं..?

पा लू सब तो क्या करूँगा,
क्या मैं तृप्ति पा सकूँगा?
गीता कुरान में क्या कहा था,
मानव मात्र का उद्देश्य यही था?
फिर मंदिरो में भीड़ क्यो हैं,
रोज़ी और नमाज़ी ही मीर क्यो हैं
धन ही जो सब दिलाता,
योग ध्यान कोई क्यो लगाता
सच जो सब ये जानते हैं,
सार ये संज्ञानते हैं,
फिर त्याग तपस्या तलवार क्यो हैं
आसान रस्ते समझ से पार क्यो हैं
इस ज्वार का उतार क्या हैं
वासना और तृष्णा का उपचार क्या हैं..?

Tuesday, 18 September 2018

तू एक बार गले लगा के देख ले.....








सारे शिक़वे झट से मिटा के देख ले,
तू एक बार गले लगा के देख ले...


कितने बंदर हमने संसद पिछले सालों में भेजे हैं
एक बार सदन में डमरू बजा के देख ले,

तेरे कदमो में तमाम उम्र की गुलामी रख दी हैं
जरा मुझे  घूंघट उठा के देख ले,

सूरज अभी भी आसमा में रोशन हैं
मायूश नाहो बादल हटा के देख ले,

एक बरसात में ये मेढ़क दुबक जायेगे
ये जज़्बात दिल में दबा के देख ले,

तेरे दिल में कितने अरमान पोशीदा हैं
फुरसत में मुझसे नज़रे मिला के देख ले,

ये झूठ के अंधेरे हैं जो tv अख़बार में छाए हैं
रोशनी का एक चिराग उठा के देख ले,

मुमकिन नही जो हम चाहे वही जहान हमारा हो
मुझे बस दिल में ही कही छुपा के देख ले,

तेरे मेरे बीच दूरियां तो हैं फासले कुछ भी नही
कभी तन्हाई में आवाज़ लगा के देख ले,

मैं भगत' हू तिलक' हूँ यू मर नही सकता
तू लाख बार मुझे सूली पे चढ़ा के देख ले,

तेरे गली का आवारा लड़का आज भी वही बैठा हैं
खिड़की खोल पर्दे हटा के देख ले,

यही आवाम इंतेखाब में इंकलाब लिखेगी
फ़िकर नही हैं हज़ार बंदिशे सौ ताले लगा के देख ले....,!!





इंतेखाब=चुनाव

Saturday, 15 September 2018

तेरे मेरे मन के नगर क्षितिज के पार होंगे...

 




 
























एक दिन ये सूरज,वो चाँद ,
तेरे भी गले का हार होगा ,
तेरे मेरे मन का नगर  क्षितिज के पार होगा
हर पेट रोटी ,
हर तन को कपड़ा
हर आँख स्वप्न साकार होगा
तेरे मेरे मन का नगर  क्षितिज के पार होगा.......


जहा जुल्म न झूठ का कोई स्थान होगा
हरेक जाति हर धर्म एक सामान होगा
मनु बस मानव धर्म निभायेगा
इंसान बस इंसा ही कहलायेगा
हर विचार हर बात को जुबान मिलेगी
हर कली निर्भीक खिलेगी
नैतिकता ही नीति का आधार होगा,
तेरे मेरे मन का नगर क्षितिज के पार होगा.....


हर गुड़िया बेझिझक स्कुल जायेगी
किसी भी बाप को चिंता नही सतायेगी
दरिद्र ना कोई विवश होगा
हर खेत हरा,हर फूल में रस होगा
हर नदी स्वच्छ निर्मल साफ होगी
फल लदी,झुकी हर एक  शाख होगी
हरेक हाथ को   फिर रोजगार होगा
तेरे मेरे मन का नगर क्षितिज के पार होगा.....


स्वपन तो ये आता रहा हैं
मुझे उस ओर बुलाता रहा है
किन्तु अभी काज कितने पड़े हैं
कितने व्यवधानों के रावण खड़े हैं
दिन रात हमको एक हैं करना
कितनी अग्नि परीक्षा पार है करना
इस धरा को स्वर्ग करके
ऑंख में राष्ट्र सेवा  भाव भरके
एक युग का स्वम निर्माण करेगे
सब लक्ष्य जब साकार करेगे
किसी के भरोसे नहीं बैठे रहेंगे ,
भागीरथ बनके जब जटा से देवधारा उतार लेंगे 
तब धरा का उद्धार होगा
तेरे मेरे मन का नगर क्षितिज के पार होगा....

Wednesday, 12 September 2018

क्या करूँ के मेरे पाँव मेरी चादर से ज्यादा हैं...!


























क्या करूँ के मेरे पाँव मेरी चादर से ज्यादा हैं
जुनून हैं के मेरे हक में मुक़द्दर से ज्यादा हैं,


चिराग हूँ हज़ार अंधेरों के वजूद मिटा सकता हूँ
मेरी अहमियत तेरे तसव्वुर से ज्यादा है

वो शाह हो तो हो मुझे मेरी मुफ़लिसी पे गुमान है
मैं दरिया हूँ मुझे सफ़र का तजुर्बा समुन्दर से ज्यादा है

हार  ही जाता  हूँ जैसे ही जीतने को होता हूँ
मसले मेरे नसीब में सिकंदर से ज्यादा है,

चौराहे पर भीड़ कौरवो की,मोड़ पर है रावण खड़ा
फेर इस चक्रव्यूह में अभिमन्यु की ख़बर से ज्यादा है,

एक आवाज़ एक इंक़लाब तुमने मुझी में दबा दिया
उस क़त्ल में दफ़न हुआ गौरीशंकर से ज्यादा है

सारी जफ़ायें जज़्बात सारे एक साथ क़त्ल हुए
तेरे सीने में जफ़र सिर्फ़ खंज़र से ज्यादा है,