Saturday, 29 September 2018

कोई मीरा अभी ये कंहा जान पायी हैं...




मैं ये कैसे कह दूँ गुलशन में बहार आयी हैं,
इन अंधेरों ने तो सौ ऑंख रात रुलाई है,


हर प्याला हर महफ़िल फ़क़त ज़हर का घूँट यहाँ,
गोया कोई मीरा अभी ये कहाँ जान पायी है,

ग़ज़ब इत्तेफ़ाक़ है कमाल की परेशानी है,
जिस-जिस को चाबी दी उसीने घर पे सेंध लगायी हैं

धीरे-धीरे सिख पाओगे धीरे-धीरे ग़र्द सफ़ा होगी,
अभी तो तुमने पहले-पहल चोट खायीं है,

घर छूटा,संसार छूटा,बैठा हूँ तन्हाई में,
तेरे इस इश्क़ में जानम,और कितनी तबाही हैं,

शोलों पर चलकर मैंने जीना सीख़ जो लिया हैं,
देखो दुनिया में,अब मेरी कितनी वाह वा ही हैं,

आँख मेरी बहता दरिया,दिल ज़ज़्बातों का  समुन्दर है,
मैं इतना अमीर हुआ हूँ ,कैसे कह दूँ सनम हरजाई है,

एक चेहरा दुनियादारी को, रोज़ सुबह चुप ओढ़ लिया,
कई काली राते मैंने सुबह-सुबह ही बस दफ़नाई हैं,

 ग़र जुदाअंजाम थे इतने  तो मिलना ही क्यो था
तुमने जहा से किस्मत लिखाई थी मैंने वही से मिटायी हैं,

Thursday, 27 September 2018

क्या मै तुम्हारे तरीके सीख पाऊँगा.....???

















कोरा ही चला था सफ़र पर
जैसे जैसे लोग मिले अपना अपना रंग छोड़  गये ,
अपने हिसाब से ही तोड़  -मरोड़ गये
अपने तज़ुर्बो को तुम्ही ने लगाया ,
तुम्ही ने हिंदू और मुसलवां बनाया
किसीने अछूत कहा किसीने शीश छुक़ाया
मैं तो बेजुबान बेहद मासूम -नादान था
नन्हा सा एक कमज़ोर जान था
तुम्हरी अगुलियां पकड़ के चला
तुम्हरे लब्जो जुबान में ढला,
साफ सफेद कागज़ पे तुमने ही  ये रंग गड़ा
जिसने जैसा जितना कहा वैसा चढ़ा,
बदल के शख्शियत मेरी अब तुम्हे परहेज़ हैं
मेरे हर रूप का जबके तू ही रंगरेज़ हैं
फिर क्या इस कसमकस से मैं जीत  पाऊँगा
तन्हाई में रोऊंगा,महफ़िल में गा
ऊँगा
तुम्हारे सामने जूठे चेहरे बनाऊँगा
बेबात हस दूंगा,अपना गुस्सा दबाऊंगा
क्या मै तुम्हारे तरीके सीख पाऊँगा....

जो बन गया हूँ  ये तुम्हारा दिया अंजाम हैं,
इंसा तो पैदाइशी फ़क़द इंसान हैं
तुम्ही उसे बंदिशों दायरों में नापते हो,
धर्मों जातियों में काटते हो,
इन्ही कायदों में जो घुले वही शरीफ हैं,
क्या यही तुम्हारी तौफ़ीक़ हैं
जफ़र क्या तू भी युही जाया होगा
दुसरो का ढाला उनका का बनाया होगा
टूट जायूँगा मै भी या
अपने मुताबिक जहांन बनायुगा
क्या मै तुम्हारे तरीके सीख पाऊँगा....

तुम्हारे सही को बस सही कहूंगा
जहा कहोगे बस वही रहूंगा
तुम्हारे रास्तो से जायूँगा
तुम्हारी छाँव में बैठूँगा
तुम्हारे आसमानो मैं ही उड़ूगा
तुम्हारे दायरों मैं लिखूँगा
इसी तौर से जीऊँगा
इसी तरीखे से बीत जायूँगा
क्या मै तुम्हारे तरीके कभी सचमें  सीख पाऊँगा.......!!!

Monday, 24 September 2018

ये दो कमरे जो कभी घर न बन सके....



प्यार बहुत करते थे मगर हमसफर न बन सके,
ये दो कमरे जो कभी घर न बन सके,


यही था दोनो का फैसला तो सिर फोड़ना कैसा,
जो नही था तकदीर में,वो उमर भर न बन सके,

लाख चाहा आँख चुरा लू ज़माने भर की बेकारी से,
ग़रीब का हशर देख के पत्थर न बन सके,

ग़ज़ल की ख़ाक में ही दबे रहे सैकड़ो जंगी,
कई इंक़लाब मेरे ग़दर न बन सके,

चिता की सी आग में लेटे रहे दोनो रात भर,
अना के पत्थर टूट कर सुकू के बिस्तर न बन सके,

ये दुनिया की साजिश थी,मुक़द्दर की कमज़ोरी,
अपनी ज़िंदगी में कभी खुशी के मंज़र न बन सके,

Thursday, 20 September 2018

तृष्णा का उपचार क्या हैं...?








कौन सी पिपासा है कौन धुन सवार है,
मनुष्य को ये किसकी तलाश हैं
धन की धुरी पर चलता जीवन,
मृत तृष्णा  सा छलता जीवन
लक्ष्य कोई नही बस एक दौड़ जारी हैं
सब सिर एक बोझ भारी हैं
परस्पर संबंधो की किसको चिंता
ट्विटर व्हाट्सएप्प से ही जिंदा
इस भौतिकता का आधार क्या हैं?
वासना और तृष्णा का उपचार क्या हैं..?

चक्की के पाटो संग पिसते,
उसूल आदर्श कहाँ अब टिकते,
स्वमं स्वार्थ के साधन सब है,
एक उल्लू  से वाहन सब हैं
जो करे सब वही हैं करना,
सीमाओं से क्या अब झगड़ना,
सोचता हूँ अकसर
इस बाधाओँ के पार क्या हैं?
वासना और तृष्णा का उपचार क्या हैं..?

पा लू सब तो क्या करूँगा,
क्या मैं तृप्ति पा सकूँगा?
गीता कुरान में क्या कहा था,
मानव मात्र का उद्देश्य यही था?
फिर मंदिरो में भीड़ क्यो हैं,
रोज़ी और नमाज़ी ही मीर क्यो हैं
धन ही जो सब दिलाता,
योग ध्यान कोई क्यो लगाता
सच जो सब ये जानते हैं,
सार ये संज्ञानते हैं,
फिर त्याग तपस्या तलवार क्यो हैं
आसान रस्ते समझ से पार क्यो हैं
इस ज्वार का उतार क्या हैं
वासना और तृष्णा का उपचार क्या हैं..?

Tuesday, 18 September 2018

तू एक बार गले लगा के देख ले.....








सारे शिक़वे झट से मिटा के देख ले,
तू एक बार गले लगा के देख ले...


कितने बंदर हमने संसद पिछले सालों में भेजे हैं
एक बार सदन में डमरू बजा के देख ले,

तेरे कदमो में तमाम उम्र की गुलामी रख दी हैं
जरा मुझे  घूंघट उठा के देख ले,

सूरज अभी भी आसमा में रोशन हैं
मायूश नाहो बादल हटा के देख ले,

एक बरसात में ये मेढ़क दुबक जायेगे
ये जज़्बात दिल में दबा के देख ले,

तेरे दिल में कितने अरमान पोशीदा हैं
फुरसत में मुझसे नज़रे मिला के देख ले,

ये झूठ के अंधेरे हैं जो tv अख़बार में छाए हैं
रोशनी का एक चिराग उठा के देख ले,

मुमकिन नही जो हम चाहे वही जहान हमारा हो
मुझे बस दिल में ही कही छुपा के देख ले,

तेरे मेरे बीच दूरियां तो हैं फासले कुछ भी नही
कभी तन्हाई में आवाज़ लगा के देख ले,

मैं भगत' हू तिलक' हूँ यू मर नही सकता
तू लाख बार मुझे सूली पे चढ़ा के देख ले,

तेरे गली का आवारा लड़का आज भी वही बैठा हैं
खिड़की खोल पर्दे हटा के देख ले,

यही आवाम इंतेखाब में इंकलाब लिखेगी
फ़िकर नही हैं हज़ार बंदिशे सौ ताले लगा के देख ले....,!!





इंतेखाब=चुनाव

Saturday, 15 September 2018

तेरे मेरे मन के नगर क्षितिज के पार होंगे...

 




 
























एक दिन ये सूरज,वो चाँद ,
तेरे भी गले का हार होगा ,
तेरे मेरे मन का नगर  क्षितिज के पार होगा
हर पेट रोटी ,
हर तन को कपड़ा
हर आँख स्वप्न साकार होगा
तेरे मेरे मन का नगर  क्षितिज के पार होगा.......


जहा जुल्म न झूठ का कोई स्थान होगा
हरेक जाति हर धर्म एक सामान होगा
मनु बस मानव धर्म निभायेगा
इंसान बस इंसा ही कहलायेगा
हर विचार हर बात को जुबान मिलेगी
हर कली निर्भीक खिलेगी
नैतिकता ही नीति का आधार होगा,
तेरे मेरे मन का नगर क्षितिज के पार होगा.....


हर गुड़िया बेझिझक स्कुल जायेगी
किसी भी बाप को चिंता नही सतायेगी
दरिद्र ना कोई विवश होगा
हर खेत हरा,हर फूल में रस होगा
हर नदी स्वच्छ निर्मल साफ होगी
फल लदी,झुकी हर एक  शाख होगी
हरेक हाथ को   फिर रोजगार होगा
तेरे मेरे मन का नगर क्षितिज के पार होगा.....


स्वपन तो ये आता रहा हैं
मुझे उस ओर बुलाता रहा है
किन्तु अभी काज कितने पड़े हैं
कितने व्यवधानों के रावण खड़े हैं
दिन रात हमको एक हैं करना
कितनी अग्नि परीक्षा पार है करना
इस धरा को स्वर्ग करके
ऑंख में राष्ट्र सेवा  भाव भरके
एक युग का स्वम निर्माण करेगे
सब लक्ष्य जब साकार करेगे
किसी के भरोसे नहीं बैठे रहेंगे ,
भागीरथ बनके जब जटा से देवधारा उतार लेंगे 
तब धरा का उद्धार होगा
तेरे मेरे मन का नगर क्षितिज के पार होगा....

Wednesday, 12 September 2018

क्या करूँ के मेरे पाँव मेरी चादर से ज्यादा हैं...!


























क्या करूँ के मेरे पाँव मेरी चादर से ज्यादा हैं
जुनून हैं के मेरे हक में मुक़द्दर से ज्यादा हैं,


चिराग हूँ हज़ार अंधेरों के वजूद मिटा सकता हूँ
मेरी अहमियत तेरे तसव्वुर से ज्यादा है

वो शाह हो तो हो मुझे मेरी मुफ़लिसी पे गुमान है
मैं दरिया हूँ मुझे सफ़र का तजुर्बा समुन्दर से ज्यादा है

हार  ही जाता  हूँ जैसे ही जीतने को होता हूँ
मसले मेरे नसीब में सिकंदर से ज्यादा है,

चौराहे पर भीड़ कौरवो की,मोड़ पर है रावण खड़ा
फेर इस चक्रव्यूह में अभिमन्यु की ख़बर से ज्यादा है,

एक आवाज़ एक इंक़लाब तुमने मुझी में दबा दिया
उस क़त्ल में दफ़न हुआ गौरीशंकर से ज्यादा है

सारी जफ़ायें जज़्बात सारे एक साथ क़त्ल हुए
तेरे सीने में जफ़र सिर्फ़ खंज़र से ज्यादा है,

Sunday, 9 September 2018

ज़िन्दगी आग हैं पानी डालते रहिये



ज़िंदगी आग हैं पानी डालते रहिये
हर मोड़ पर दिल का सिक्का उछालते रहिये,


दिखने लगी हैं नमी,हसीन  आँखों में
अल्लाह उसका काजल सँभालते रहिये,

धड़कनें बेजान हो जाती हैं बेचैन रातों को
हर सुबह मुर्दों  में जान डालते रहिये

टूट कर वो बाहों में पिघल जायेगा
दिल में ये ख़्वाब  पालते रहिये,

 कुछ दिनों में हम ज़िद छोड़ ही देगे
 आप बस हमारी बात टालते रहिये,

चाँद की जुर्रत नहीं कि टिक पाये
चाँदनी रात में धीरे-धीरे घूँघट निकालते रहिये,

एक रोज़ मैं लौटूँगा शगुन का सिक्का लेके
आप हाथों की मेहँदी संभालते रहिये,

तुम्हारे ख़्वाबों  की इमारत बहुत बुलंद हैं
तेज़ धूप में अभी पत्थर निकलते रहिये....

Wednesday, 5 September 2018

दुश्मन मिले हैं दोस्तों के लिबास में....
















राजदार ने मिला दी जिंदगी खाक में
दुश्मन मिले हैं दोस्तों के लिबास में..

घौसले उजड़ गए परिंदे निकल गए
क्या अब और रखा हैं तलाक में,

मौत ने भी उसकी इंकलाब पैदा किया
कुछ आग बची रह गयी थी राख़ में,

गले भी मिलता हैं तो खजर निकाल लेता हूँ
ये कौन ज़हर घोल रहा हमारे दिमाक में,

बाखुदा ये दिन भी था हमारी किश्मत में,
हाथ जो तुमने रख  दिया मेरे हाथ में,

मैं भी तुमको लूट के विलायत भाग जायूँगा
तुम उलझे रहो मज़हबी दंगे फसाद में,

जिक्र तुम्हारा हो तो खुद सर झुका लू
तूने क्या छोड़ा हैं जो बोल दू मैं जवाब मे,

लाख कोशिश करो अब जफ़र को पा नहीं सकते
लुत्फ लेने हैं अब हम इसी प्यास में.... !!!