Friday, 26 September 2014

तीर सारे मेरे तरकस के बेकार गये

तीर सारे मेरे तरकस के बेकार गये
रौशनी के सौदागर जुगनुओ से हार गये

साथ होते तो तुफानो से भी निकाल लाते
तुम तो हमको मझधार मैं उतार गये
वो मुसाफिर जिनकी नज़र चाँद पर थी
कदमो तले कितने चिरागों को मार गये
गाँव में जब जब आमो पे बौर लगे
चचा मेरे शहर दो चार पेटी उतार गये
बंद खिड़की दरवाजों में मैंने खुद को छिपा लिया
मुफलिसी में ऐसे कितने ही त्यौहार गये
उधर में जिंदगी बनाने में मुशरुख था
गाँव में कितने अपने स्वर्ग सिधार गये
मेहनतो की नीद मेरी शामो पर भारी थी
आराम की रोटी,नीद की गोलियों में उतार गये
कल सितारों की महफ़िल से क़तरा ज़मी पे गिरा ,
हम नींद  में ही अपनी दूनिया उजाड़ गये।