Tuesday, 8 September 2026

किसी शहर में मेरा हक़दार बाक़ी है..







 दर्द की तह में गुलज़ार बाक़ी है

मेरे ज़िगर में ख़ुशबू ए यार बाक़ी है 


तुम मुझसे क्यों इतनी नज़दीकियाँ दिखाते हो 

किसी शहर में मेरा हक़दार बाक़ी है,


डर लगता है इन नई हवाओं में

उस पुराने सज़र का दिल तलबगार बाक़ी है ,


यू तो अपने बीच अब कुछ बाक़ी ना रहा 

दिल के किसी कोने में बस एक मिठास बाक़ी है,


आईने में वही चेहरा हर शक्स में अक्श तराशता हूँ

किसी तड़फ़ है ये कौनसी प्यास बाक़ी है,


सहबा उठ गये फ़ैसला माबूद हुआ 

जाने क्यो दिल फिर भी उदास बाक़ी है ,