Thursday, 1 November 2018

बैठ के सुबह शाम को मैं लिखता रहा ,


 
 
बैठ के सुबह शाम को,मैं लिखता रहा ,
ख़त एक अन्जान को मैं लिखता रहा .


नीद कम आंख नम होने लगी ,
फिर भी ख्याल गुमनाम को मैं लिखता रहा ....

और भी शै हैं मैंने जाना नही,
सिर्फ तेरी मुस्कान को मैं लिखता रहा ...

जब जब तुमको देखा सोचा किया ,
एक नज़्म तेरे सलाम को  मैं लिखता रहा ...

हाले दिल तो कुछ तुमसे कह ना सका ,
ख़त में अपनी जुबान को मैं लिखता रहा ...

लाश में मेरी जिन्दा तू रह गयी,
बात ये रोज़,शमशान को मैं लिखता रहा ...

अंजाम मोहब्बत का नज़र आ रहा ,
जाने क्यों मौत के सामान को मैं लिखता रहा ...




चित्र गूगल आभार