Wednesday, 14 November 2018

बंद होके लिफाफे में,घर आ जाया तो करो .




रस्में ख़त कभी-कभी निभाया तो करो ,
बंद होके 
लिफ़ाफ़े में,घर आ जाया तो करो ...


ख़ुद ही सरका दो पह्लू ,हसीन जानो से,
घबरा कर फिर,दांतों तले ऊंगलिया दबाया तो करो .

हमको भी अपनी हदों का कुछ एहसास तो हो,
पास बुलाकर कभी आजमाया तो करो .

मैं तुम्हारा ,तुम मेरा सहारा हो तो सही,
शरमा कर कभी बाहों में पिघल जाया तो करो .

कौन कहता हैं यूँ न बदलेंगे हालात-ए-हाल,
दिल में क़भी इंक़लाब की शमा जलाया तो करो .

इतनी भी मुश्किल नहीं,बग़ावत और इंसाफ़ की ज़िद ,
तबीयत से कभी क़लम उठाया तो करो .

वक़्त का ये मरहम ,हर ज़ख़्म भर ही देता हैं ,
मेरे सिवा  कहीं दिल लगाया तो करो .
बंद होके लिफ़ाफ़े मेंं घर आ जाया तो करो .......