Monday, 26 May 2014

ये रात एक मज़बूरी सी हो गयी है

ये रात एक मज़बूरी सी हो गयी है
जिसको हम दोनों लाधे है
अरसे से अपने सिरहानो से बांधे हें...
ना मेरे दर्द की तुमको कोई चुभन है
तुम्हारे खालीपन का मुझको भी कोई एहसास नही
नीद में कभी हाथ छू भी ले जरा
अपनी हदों में दुरिया लौट आती है
ये गल रही सड रही बदल रही
जो कभी थी मुकम्मल हमारे होने से
मुझमे तुममे अधूरी हो गयी हैं
ये रात मज़बूरी हो गयी है।