Monday, 9 March 2015

मेरा इश्क़ तेरी बंदगी से बड़के हैं


मेरा इश्क़ तेरी बंदगी से बड़के हैं
जैसे राधा का रिश्ता रुक्मणी से बड़के हैं

मूर्छित हुआ जिसने प्रेम का अपमान किया
लछमन का क्रोध कब श्रद्धा सबरी से बड़के हैं

मेरे लबो से मिश्री अबतक घुली नही
अल्लाह उसके होठ चासनी से बड़के हैं

तेरे रुखसार पर एक बेचैनी तराशता देती हैंँ
मेरी नज़र भी जोहरी से बड़के है

तेरे शहर की रौनक शामें तु ही संभाल
मेरे खेत का कलेवा तेरी दाल मखनी से बड़के हैं