Wednesday, 4 March 2015

गले से लगा मगर आँख से उतर गया. .....

गले से लगा मगर आँख से उतर गया
तेरा एक फैसला कितने फासले कर गया

बात वो बात अब शायद कभी न हो
जहर तो जानेमन उमरभर को घुल गया

तू मेरा फक्र मेरा गुरुर था मेरे हमसफ़र
देखा जो तेरे हौसले मैँ डर गया

कुछ परिंदे कभी लौट कर नही आये,
दूध सी ज़िन्दगी में,एक बूद जो खट्टा पड़ गया

घर का वीराना उसे तलाश करता हैं
पायलों को झनझन में सन्नाटे जो भर गया

दफ्तरो में ताले लगे हैं रास्ते सुनसान हैं
सुना हैं कल कोई इंसानियत का क़त्ल कर गया


7 comments:

  1. कुछ परिंदे कभी लौट कर नही आते
    दूध सी ज़िन्दगी में,एक बूद जो खट्टा पड़ गया
    बहुत खूब ... नया सा प्रयास इस शेर में ... बहुत ही लाजवाब लगा ...

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  2. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  3. बात वो बात अब शायद कभी न हो
    जहर तो जानेमन उमरभर को घुल गया

    वाह, कितनी सटीक बात कही है।

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  4. बहुत खूबसूरत और सीख देने वाली रचना। कभी कभी हम ऐसी गलतियां करते हैं। जो गले लगने के बाद भी अपना असर छोड़ना बंद नहीं करतीं। बेहद अच्‍छी रचना।

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  5. Damdaar sher:
    दफ्तरो में ताले लगे हैं रास्ते सुनसान हैं
    सुना हैं कल कोई इंसानियत का क़त्ल कर गया

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  6. Damdaar sher:
    दफ्तरो में ताले लगे हैं रास्ते सुनसान हैं
    सुना हैं कल कोई इंसानियत का क़त्ल कर गया

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  7. क्या बत है सर।एक-एक शेर लाज़वाब।बहुत खूब।

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