Friday, 20 March 2015

आखिर मुझमे मेरा क्या हैं...

आखिर मुझमे मेरा क्या हैं,
तुम लोगो की रश्मो रिवाजो
घुटन की जंजीरो में,
कशमकश की जद्दो जहद में
हाथो की खाली लकीरो में
ये करो ये ना करो की तकरीरों में
इन तशविरो में ताबिजो में
तुमने मेरा छोड़ा क्या हैं
आखिर मुझमे मेरा क्या हैं....

थोडा थोडा रोज़ कटता जाता हूँ
तुम्हारे मुताबिक बटता जाता हूँ
कैसी ओड़ी मज़बूरी हैं
बेचैन खुद,दुनिया में घुलती कस्तूरी हैं
बामुश्किल हैं बाधा खुदको
तुम्हारे ताबूतों में नापा खुदको
तुम्हारी सुनी तुम्हारी करी
मर गया हैं मुझमे मैं ही
तुमने ही ये जहर पिलाया,
पहरो में आवाज़ों को दबाया
फिर रोना धोना झूठ बनावटी घेरा क्या हैं
आखिर मुझमे मेरा क्या हैं......

मुझको मैं ही बनने देते,
गिरने देते लड़ने देते
ठोकरों  की चक्की में छनने देते
मुझको यु न बाधा होता,
पा लेता जो कुछ पाना होता
मंजिले सब अपनी बनांते,
परिंदे आसमानों में बेख़ौफ़ उड़ पाते
तुमने पिंजरा जो खोला होता
कफ़स ने अब जिन्दा छोड़ा क्या हैं
आखिर मुझमे मेरा क्या हैं......