Saturday, 15 September 2018

तेरे मेरे मन के नगर क्षितिज के पार होंगे...

 




 
























एक दिन ये सूरज,वो चाँद ,
तेरे भी गले का हार होगा ,
तेरे मेरे मन का नगर  क्षितिज के पार होगा
हर पेट रोटी ,
हर तन को कपड़ा
हर आँख स्वप्न साकार होगा
तेरे मेरे मन का नगर  क्षितिज के पार होगा.......


जहा जुल्म न झूठ का कोई स्थान होगा
हरेक जाति हर धर्म एक सामान होगा
मनु बस मानव धर्म निभायेगा
इंसान बस इंसा ही कहलायेगा
हर विचार हर बात को जुबान मिलेगी
हर कली निर्भीक खिलेगी
नैतिकता ही नीति का आधार होगा,
तेरे मेरे मन का नगर क्षितिज के पार होगा.....


हर गुड़िया बेझिझक स्कुल जायेगी
किसी भी बाप को चिंता नही सतायेगी
दरिद्र ना कोई विवश होगा
हर खेत हरा,हर फूल में रस होगा
हर नदी स्वच्छ निर्मल साफ होगी
फल लदी,झुकी हर एक  शाख होगी
हरेक हाथ को   फिर रोजगार होगा
तेरे मेरे मन का नगर क्षितिज के पार होगा.....


स्वपन तो ये आता रहा हैं
मुझे उस ओर बुलाता रहा है
किन्तु अभी काज कितने पड़े हैं
कितने व्यवधानों के रावण खड़े हैं
दिन रात हमको एक हैं करना
कितनी अग्नि परीक्षा पार है करना
इस धरा को स्वर्ग करके
ऑंख में राष्ट्र सेवा  भाव भरके
एक युग का स्वम निर्माण करेगे
सब लक्ष्य जब साकार करेगे
किसी के भरोसे नहीं बैठे रहेंगे ,
भागीरथ बनके जब जटा से देवधारा उतार लेंगे 
तब धरा का उद्धार होगा
तेरे मेरे मन का नगर क्षितिज के पार होगा....